Hindi mein poem. Patriotic Poems in Hindi 2018-07-19

Hindi mein poem Rating: 5,5/10 888 reviews

Poem in Hindi

hindi mein poem

. पुस्तकों में है नहीं, छपी हुई इसकी कहानी, हाल इसका ज्ञात होता, है न औरों की ज़बानी, अनगिनत राही गए इस राह से, उनका पता क्या, पर गए कुछ लोग इस पर, छोड़ पैरों की निशानी, यह निशानी, मूक होकर भी बहुत कुछ बोलती है, खोल इसका अर्थ, पंथी, पंथ का अनुमान कर ले! Baas ekhee tamanna hai…main pyar se chhoo loon tumko Teree hothon ki madira main khud ko pagal kar doon Aisee is madakta ne, jeene kee tamanna de hai Main pyar karoon tumko yeh dill ne bataya hai Tere pyar ke baton ne, mere dill ko churaya hai aneeR in akhon mein, tere roop kee chhaya hai. लिखूँ कुछ ऐसा कि सबके दिलों को जोड़ सकूँ झूठ का पर्दाफाश करूँ और सच का मैं आगाज़ करूँ काश! Idhar gaon ki taal- talayya, Amraie us paar hai, Baki phaile khetao ka to, koie oar na chhor hai, door- door tak peele — neele, dhanao ka lehrav hai. Par sada hi yeh dikhata hai samay, dhang unke ek-se hotay nahi. अपने जीवन का रस देकर जिसको यत्नों से पाला है — क्या वह केवल अवसाद-मलिन झरते आँसू की माला है? भोगी कुसुमायुध योगी-सा, बना दृष्टिगत होता है॥ किस व्रत में है व्रती वीर यह, निद्रा का यों त्याग किये, राजभोग्य के योग्य विपिन में, बैठा आज विराग लिये। बना हुआ है प्रहरी जिसका, उस कुटीर में क्या धन है, जिसकी रक्षा में रत इसका, तन है, मन है, जीवन है! सायो का अँधियारा अब किस्मत पर छा गया पलक झपकते ही सारा खेल बदल गया सोचती हूँ शायाद गलियारे न जाती तो न ये साए होते न ये अन्धीयारी किस्मत प़र क्या ये सच है की गर रास्ता बदल जाता तो किस्मत भी बदल जाती? I remember these few lines of a poem. Mujhe kavi aur kavita ka naam to yaad nahi par ye kavita Krishan- Arjun -Duryodhan sanvad ke vishay main hai jab yudha se pahle dono krishan ke pas madad ke liye jaate hai.

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Patriotic Poems in Hindi

hindi mein poem

तुम्हें देख कर स्निग्ध चाँदनी भी जो बरसावे रवि! I had it in my 8th grade and I only remember a part of it. फिर अस्पताल की उनकी फोटो अपलोड कर दी फेसबुकिया यारों ने भी 'लाइक' मार-मार कर अपनी 'ड्यूटी' पूरी कर दी। - नरेंद्र शर्मा हिन्दुअन की हिन्दुआई देखी तुरकन की तुरकाई! ठुकरा दो या प्यार करो देव! Ye bat hai sayad us din ki jab mile hum tum usi jagah, Jaha ambar milta hia dharti se mile the hum kuch usi tarah Chhitiz Woh pahli nazar ka rishta tha jo miane tumse jod liya, Muh se na shab ek nikla aur dil ne sab kuch bola diya. I am not very sure how many people know this person, even I am not very confident but have read some of his poems. Haqueekat to yeh hai ki, Vo sab aache dost mere dil k paas hai, Aur tere liye bahut khas hai, Kyonki yeh to keval rabb hi janta hai ki kiska dil to kiske paas hai. Do saache waqak hi toh chahiye, ushse phir bolane k liye, Yun sabdo ka jaal kyun bune ja rahe ho? Ugenge, choobhenge nishchit hi kante phir se, aur phool kabhi komal sparsh bhi honge zindagi ki rah jatil badi hai — beta hota mod naya hi har din bas baat yahi ek satya khari hay.

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December mein

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I am missing some lines!! शब्द वन्देमातरम् । हिंद हो या मुसलमान सब कहते वन्देमातरम् ॥ - सुशांत सुप्रिय हर बार अपनी तड़पती छाया को अकेला छोड़ कर लौट आता हूँ मैं जहाँ झूठ है , फ़रेब है , बेईमानी है , धोखा है -- हर बार अपने अस्तित्व को खींच कर ले आता हूँ दर्द के इस पार जैसे-तैसे एक नई शुरुआत करने कुछ नए पल चुरा कर फिर से जीने की कोशिश में हर बार ढहता हूँ , बिखरता हूँ किंतु हर हत्या के बाद वहीं से जी उठता हूँ जहाँ से मारा गया था जहाँ से तोड़ा गया था वहीं से घास की नई पत्ती-सा फिर से उग आता हूँ शिकार किए जाने के बाद भी हर बार एक नई चिड़िया बन जाता हूँ एक नया आकाश नापने के लिए. धूल उड़ी या रंग उड़ा है, हाथ रही अब कोरी झोली। आँखों में सरसों फूली है, सजी टेसुओं की है टोली। पीली पड़ी अपत, भारत-भू, फिर भी नहीं तनिक तू डोली! You can send these Poems to your friends, parents, brother, sister, , colleague etc. मैंने मुख्य उसी को जाना जो वे मन में लाते । सखि, वे मुझसे कहकर जाते । स्वयं सुसज्जित करके क्षण में, प्रियतम को, प्राणों के पण में, हमीं भेज देती हैं रण में — क्षात्र-धर्म के नाते । सखि, वे मुझसे कहकर जाते । हुआ न यह भी भाग्य अभागा, किसपर विफल गर्व अब जागा? Mere dosto mein sabse pehle tumhara hi naam aata hai, Rabb ki kasam humara pichle kai janmo se nata hai. आ गया बसंत है, छा गया बसंत है नया-नया रंग लिए आ गया मधुमास है आंखों से दूर है जो वह दिल के पास है फिर से जमुना तट पर कुंज में पनघट पर खेल रहा छलिया. Mein zeezak uttha hooa bechain sa lal ho kar aankh bhi dookhnay lagi. साहस से बढ़े युबक उस दिन, देखा, बढ़ते ही आते थे! सदियों की ठंढी-बुझी राख सुगबुगा उठी, मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है; दो राह,समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो, सिंहासन खाली करो कि जनता आती है। जनता? But time chose the another way!!! Nazar Chahti Hai Deedar Karna, Dil Chahta Hai Pyaar Karna, Kya Bataoon Is Dil Ka Aalam, Nasib Me Likha Hai Intezar Karna… Kisi na Kisi Pe Kisi Ko Aitbaar Ho Jaata Hai, Ajnabi Koi Shaks Yaar Ho Jaata Hai, Khoobiyon Se Nahi Hoti Mohabbat Sada Khamiyon se Bhi Aksar Pyaar Ho Jaata Hai… Dear Vinay Chopra, I had this poem Kshudra ka Mahatva in my grade 7 when I was about 12. Please do your comments on this poem, if you like it or want me to improve something in it.

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Hindi Poem on Mobile

hindi mein poem

Unfortunately, instead of Devnagari, the script is in English. Jo beet gayi so baat gayi …… Jeevan mein ek sitara tha Maana woh behad pyara tha Woh doob gaya to doob gaya Ambar ke aanan ko dekho Kitne iske tare toote Kitne iske pyare choote Par bolo toote taron par Kab ambar shok manata hai Jo beet gayi so baat gayi …. Besides a translation of interface makes it unreadbale, even if to no one else, to myself. मै तो आलि चिर-म्रियमाण। - कबीरदास Kabirdas ऋतु फागुन नियरानी हो, कोई पिया से मिलावे । सोई सुदंर जाकों पिया को ध्यान है, सोई पिया की मनमानी, खेलत फाग अगं नहिं मोड़े, सतगुरु से लिपटानी । इक इक सखियाँ खेल घर पहुँची, इक इक कुल अरुझानी । इक इक नाम बिना बहकानी, हो रही ऐंचातानी ।। पिय को रूप कहाँ लगि बरनौं, रूपहि माहिं समानी । जौ रँगे रँगे सकल छवि छाके, तन- मन सबहि भुलानी। यों मत जाने यहि रे फाग है, यह कछु अकथ- कहानी । कहैं कबीर सुनो भाई साधो, यह गति विरलै जानी ।। - कबीर - रबीन्द्रनाथ टैगोर Rabindranath Tagore हुत वासनाओं पर मन से हाय, रहा मर, तुमने बचा लिया मुझको उनसे वंचित कर । संचित यह करुणा कठोर मेरा जीवन भर। - विष्णु प्रभाकर Vishnu Prabhakar समा जाता है श्वास में श्वास शेष रहता है फिर कुछ नहीं इस अनंत आकाश में शब्द ब्रह्म ढूँढ़ता है पर-ब्रह्म को - मैथिलीशरण गुप्त Mathilishran Gupt शुभ शान्तिमय शोभा जहाँ भव-बन्धनों को खोलती, हिल-मिल मृगों से खेल करती सिंहनी थी डोलती! Par Na Jane kyun aasman mein ek cheed sa nazar aata hai. वक़्त पीछे ही पड़ गया मेरे.

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Best Friend (In Hindi) Poem by SINGH SINGH

hindi mein poem

. इसके अँचल में बहती हैं गंगा सजकर नवफूल पत्र! Pag age ka rahi itna nahi asaan hai. Hi everyone, I am new to this forum this is really a good platform for poems. ताता गोदरेजवाली पारसी सेठों की बोली? जीवन के नवल वर्ष आओ, नूतन-निर्माण लिये, इस महा जागरण के युग में जाग्रत जीवन अभिमान लिये; - सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' Suryakant Tripathi 'Nirala' मैं जीर्ण-साज बहु छिद्र आज, तुम सुदल सुरंग सुवास सुमन, मैं हूँ केवल पतदल-आसन, तुम सहज बिराजे महाराज। - रोहित कुमार 'हैप्पी' नये बरस में कोई बात नयी चल कर लें तुम ने प्रेम की लिखी है कथायें तो बहुत किसी बेबस के दिल की 'आह' जाके चल सुन लें तू अगर साथ चले जाके उसका ग़म हर लें नये बरस में कोई बात नयी चल कर लें. I am attaching the poem below.


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Hindi Poem on Mobile

hindi mein poem

कुछ बिन मांगे मिल जाती हैं. Read short, long, best, famous, and modern examples of Hindi poetry. कई लोग इस रचना को हरिवंशराय बच्चन जी द्वारा रचित मानते हैं। लेकिन श्री अमिताभ बच्चन ने अपनी में स्पष्ट किया है कि यह रचना सोहनलाल द्विवेदी जी की है। — — आ रही रवि की सवारी! To which Duryodhana rufuge any try to capture Sri Krishna. Isme bhala kiski bhalai hai? बाँध लिया तुमने मुझको स्वप्नों के आलिंगन में! Laais ho tum kis khubi se tevar se saaf bayan hota hai. Aur garint ke ghantey main ek shanka khas laga karti thi. तुम्हें स्मरण कर जी उठते यदि स्वप्न आँक उर में छवि, तो आश्चर्य प्राण बन जावें गान, हृदय प्रणयी कवि? This is really beautifully narratted poem. Do gaaj zamin hi toh chahiye, ishme sama jane k liye, Ish k liye kyun lade ja rahe ho? Poems on New Year is the perfect way to spread the Sprit of New Year and share the feeling of joyousness and thoughts with an emotional touch on this beautiful celebration Day.

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तू खुद की खोज में निकल

hindi mein poem

ऐसी इस दुनिया में कहानियां बहुत है…. वो ज़रूर सपने में आएगी. हवालात-सी रातें दिन कारागारों से रक्षक घिरे हुए चोरों से बटमारों से बंद पड़ी इजलास जमानत के मौसम फिर कब आयेंगे? I was looking for a hindi poem. . मालूम है कोई मोल नहीं मेरा, फिर भी, कुछ अनमोल लोगो से रिश्ता रखता हूँ…! Akhir uski mehnat bekar nahin hoti, koshish karne walon ki haar nahin hoti. Sahra band kar baithe ho bankar kisi k Raj tum Dekho jara nazar ghuma kar ush laash ko, jish k ho zimmedar tum Gito se bhari hai mehfil teri Ush khamoshi ko bhi suno,jish me bhari hai dikaar teri Puchlo toh sawal khud se aaj tum Kaunsi kimat chukai hai aaj ushne tujhe bachane k liye Aur kya kimat lauta rahe ho tum Baithe ho aaj bankal ma k laal tum.

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हिन्दी दिवस पर कविता

hindi mein poem

उमड़ा स्नेह-सिन्धु अन्तर में, डूब गयी आसक्ति अपार । देह, गेह, अपमान, क्लेश, छि:! है बिखेर देती वसुंधरा, मोती, सबके सोने पर, रवि बटोर लेता है उनको, सदा सवेरा होने पर। और विरामदायिनी अपनी, संध्या को दे जाता है, शून्य श्याम-तनु जिससे उसका, नया रूप झलकाता है। सरल तरल जिन तुहिन कणों से, हँसती हर्षित होती है, अति आत्मीया प्रकृति हमारे, साथ उन्हींसे रोती है! Mujhse Pucha Kisi Ne Dil Ka Matlab? Madhumoti dedicated to great Indian philosopher and Haalawadi poet Late Dr. Here it goes:- गिनो न मेरी श्वास, छुए क्यों मुझे विपुल सम्मान? I found it on: Phool Aur Kante Written By: Ayodhya Singh Hariaudh Hai janam lete jagat mein ek hi, Ek hi pauda unhe hai palta. जब हर कोई वापस जाय. नेतृत्व न मेरा छिन जावे क्यों इसकी हो परवाह मुझे? घर-आँगन सब आग लग रही सुलग रहे वन-उपवन दर-दीवारें चटख रही हैं जलते छप्पर-छाजन तन जलता है, मन जलता है जलत जन-घन-जीवन एक नहीं जलते सदियों से जकड़े गर्हित बन्धन। दूर बैठकर ताप रहा है, आग लगाने वाला मेरा देश जल रहा, कोई नहीं बुझाने वाला। भाई की गर्दन पर भाई का तन गया दुधारा सब झगड़े की जड़ है पुरखों के घर का बँटवारा एक अकड़ कर कहता अपने मन का हक ले लेंगे और दूसरा कहता तिल भर भूमि न बँटने देंगे पंच बना बैठा है घर में, फूट डालने वाला मेरा देश जल रहा, कोई नहीं बुझाने वाला। दोनों के नेतागण बनते अधिकारों के हामी किन्तु एक दिन को भी हमको अखरी नहीं गुलामी दोनों को मोहताज हो गए दर-दर बने भिखारी भूख, अकाल, महामारी से दोनों की लाचारी आज धार्मिक बना, धर्म का नाम मिटाने वाला मेरा देश जल रहा, कोई नहीं बुझाने वाला। होकर बड़े लड़ेंगे यों यदि कहीं जान मैं लेती कुल — कलंक — संतान सौर में गला घोंट मैं देती लोग निपूती कहते पर यह दिन न देखना पड़ता मैं न बँधनों में सड़ती छाती में शूल न गड़ता बैठी यही बिसूर रही माँ, नीचों ने धर घाला मेरा देश जल रहा, कोई नहीं बुझाने वाला। भगतसिंह अशफाक, लालमोहन, गणेश बलिदानी सोच रहे होंगे हम सब की व्यर्थ गई कुरबानी जिस धरती को तन की देकर खाद, खून से सींचा अंकुर लेते समय, उसी पर किसने जहर उलीचा हरी भरी खेती पर ओले गिरे, पड़ गया पाला मेरा देश जल रहा, कोई नहीं बुझाने वाला। जब भूखा बंगाल, तड़प मर गया ठोंक कर किस्मत बीच हाट में बिकी तुम्हारी माँ-बहनों की अस्मत जब कुत्तों की मौत मर गए बिलख-बिलख नर-नारी कहाँ गई थी भाग उस समय मरदानगी तुम्हारी तब अन्याय का गढ़ तुमने क्यों न चूर कर डाला मेरा देश जल रहा, कोई नहीं बुझाने वाला। पुरखों का अभिमान तुम्हारा और वीरता देखी, राम-मुहम्मद की सन्तानो व्यर्थ न मारो शेखी, सर्वनाश की लपटों में सुख-शान्ति झोंकने वालो भोले बच्चों, अबलाओं के छुरा भोंकने वालो ऐसी बर्बरता का इतिहासों में नहीं हवाला मेरा देश जल रहा, कोई नहीं बुझाने वाला। घर-घर माँ की कलख पिता की आह, बहन का क्रन्दन हाय, दुधमुँहे बच्चे भी हो गए तुम्हारे दुश्मन? Jab kisi dhangse nikal tinka gaya tab samaz ne yoon muze taane diye, enthta tu kis liye itna raha ek tinka hai bahot tere liye! स्वप्न आता स्वर्ग का, दृग-कोरकों में दीप्ति आती, पंख लग जाते पगों को, ललकती उन्मुक्त छाती, रास्ते का एक काँटा, पाँव का दिल चीर देता, रक्त की दो बूँद गिरतीं, एक दुनिया डूब जाती, आँख में हो स्वर्ग लेकिन, पाँव पृथ्वी पर टिके हों, कंटकों की इस अनोखी सीख का सम्मान कर ले, पूर्व चलने के बटोही, बाट की पहचान कर ले! इसी पुजारिन को समझो। दान-दक्षिणा और निछावर इसी भिखारिन को समझो॥ मैं उनमत्त प्रेम की प्यासी हृदय दिखाने आयी हूँ। जो कुछ है, वह यही पास है, इसे चढ़ाने आयी हूँ॥ चरणों पर अर्पित है, इसको चाहो तो स्वीकार करो। यह तो वस्तु तुम्हारी ही है ठुकरा दो या प्यार करो॥ — सुभद्रा कुमारी चौहान यह कदम्ब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे मै भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे ले देती यदि मुझे बांसुरी तुम दो पैसे वाली किसी तरह नीची हो जाती यह कदम्ब की डाली तुम्हे नहीं कुछ कहता, पर मै चुपके चुपके आता उस नीची डाली से अम्मा ऊँचे पर चढ़ जाता वही बैठ फिर बड़े मजे से मै बांसुरी बजाता अम्मा-अम्मा कह बंसी के स्वर में तुम्हे बुलाता सुन मेरी बंसी माँ, तुम कितना खुश हो जाती मुझे देखने काम छोड़कर, तुम बाहर तक आती तुमको आती देख, बांसुरी रख मै चुप हो जाता एक बार माँ कह, पत्तो में धीरे से छिप जाता तुम हो चकित देखती, चारो ओर ना मुझको पाती व्याकुल-सी हो तब कदम्ब के नीचे तक आ जाती पत्तो का मरमर स्वर सुन, जब ऊपर आँख उठाती मुझे देख ऊपर डाली पर, कितना घबरा जाती गुस्सा होकर मुझे डांटती, कहती नीचे आ जा पर जब मै ना उतरता, हंसकर कहती मून्ना राजा नीचे उतरो मेरे भैया, तुम्हे मिठाई दूंगी नए खिलौने-माखन-मिश्री-दूध-मलाई दूंगी मै हंसकर सबसे ऊपर की डाली पर चढ़ जाता वही कही पत्तो में छिपकर, फिर बांसुरी बजाता बुलाने पर भी जब मै ना उतारकर आता माँ, तब माँ का ह्रदय तुम्हारा बहुत विकल हो जाता तुम आँचल फैलाकर अम्मा, वही पेड़ के नीचे ईश्वर से विनती करती, बैठी आँखे मीचे तुम्हे ध्यान में लगी देख मै, धीरे-धीरे आता और तुम्हारे आँचल के नीचे छिप जाता तुब घबराकर आँख खोलती और माँ खुश हो जाती इसी तरह खेला करते हम-तुम धीरे-धीरे यह कदम्ब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे मै भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे सुभद्रा कुमारी चौहान ……………………………. . कितना था रहा निखर। मिलने चलते अब दो कन आकर्षण -मय चुम्बन बन दल की नस-नस में बह जाती लघु-मघु धारा सुन्दर। हिलता-डुलता चंचल दल, ये सब कितने हैं रहे मचल कन-कन अनन्त अम्बुधि बनते कब रूकती लीला निष्ठुर । तब क्यों रे, फिर यह सब क्यों यह रोष भरी लीला क्यों? जो परवश होकर बहता है, वह खून नहीं, पानी है! Aaj to zid hain kuch likhunga main. मैं प्रस्तुत हूं चाहे मिट्टी जनपद की धूल बने — फिर उस धूली का कण-कण भी मेरा गतिरोधक शूल बने! बाकी होश तभी तक जब तक जलता तूर नहीं है; थककर बैठ गये क्या भाई! पीनेवालों ने मदिरा का मूल्य, हाय, कब पहचाना? Unicode encoding will be used on this site.

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